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Science Unsolved 2021 Class 10 Science Set 2 (824 HZ) खण्ड क भौतिक विज्ञान

Science Unsolved 2021 
Class 10
Science
Set 2 (824 HZ)

खण्ड क
भौतिक विज्ञान

1. (क) एक दर्पण के सामने रखी वस्तु का प्रतिबिंब आभासी, सीधा व बड़ा बनता है। वह दर्पण कैसा है ?

(i) अवतल 
(ii) उत्तल
(iii) समतल
(iv) इनमें से कोई भी नहीं

उत्तर - (i) अवतल


(ख) काँच के प्रिज्म से जब श्वेत प्रकाश की किरण गुजरती है तो वह अपने अवयवीय रंगों में विभक्त होती है। किस रंग के लिए विचलन सबसे अधिक है?

(i) लाल
 (ii) पीला 
(iii) हरा 
 (iv) बैंगनी

उत्तर - (iv) बैंगनी

(ग) वैद्युत मोटर परिवर्तित करता है

(i) यांत्रिक ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में
(ii) यांत्रिक ऊर्जा को वैद्युत ऊर्जा में
(iii) वैद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में
(iv) रासायनिक ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में

 उत्तर - (iii) वैद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में


(घ) विद्युत विभवान्तर का मात्रक है

(i) एम्पीयर 
(ii) ओम
(iii) वोल्ट 
(iv) वाट

उत्तर - (iii) वोल्ट

2. (क) निर्वात में प्रकाश का वेग 3 x 108 मीटर प्रति सेकण्ड है। एक पदार्थ जिसका अपवर्तनांक 1.5 है, में प्रकाश के वेग की गणना कीजिए।

उत्तर -
 निर्वात में प्रकाश का वेग C = 3 x 108 m/s
अपवर्तनांक n = 1.5 
पदार्थ प्रकाश के वेग v = ?
   n = C / v
   v = C / n
      = (3 x 108 ) / 1.5 
      = (30 × 108 ) / 15
   v = 2 × 108 m/s

(ख) एक अवतल दर्पण जिसकी फोकस दूरी 20 सेण्टीमीटर है, इसके सामने एक वस्तु उससे 60 सेण्टीमीटर की दूरी पर रखी है। वस्तु के प्रतिबिम्ब की स्थिति की गणना कीजिए।

उत्तर - अवतल दर्पण के लिए,
 फोकस दूरी f = - 20 cm
वस्तु की दर्पण से दूरी u = - 60 cm
वस्तु के प्रतिबिम्ब की स्थिति v = ?
दर्पण सूत्र से,
1/v + 1/u = 1/f
1/v = 1/f - 1/u
   = 1/(-20) - 1/(-60)
   = -1/20 + 1/60
   = (-3 +1)/60
   = (-2)/60
   = -1 / 30
 v = - 30 cm

(ग) गणना करके बताइए कि 1 किलोवाट घंटा (1 kWh) ऊर्जा का मान जूल में क्या होगा।

उत्तर -  1 किलोवाट घंटा = 1 × 1000 × 60 × 60 जूल
 = 3600000 जूल
 = 3.6 × 106 जूल

 3. (क) निकट दृष्टि दोष से पीड़ित एक व्यक्ति अधिक से अधिक 5 मीटर की दूरी तक देख सकता है। सही दृष्टि के लिए उसे किस फोकस दूरी के लेंस की आवश्यकता होगी?

उत्तर-  निकट दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति के सामने वस्तु अनंत पर होनी चाहिए
u = - ∞
v = - 5 m
लेंस सूत्र का उपयोग,
1/f = 1/v - 1/u
      = 1/(-5) - 1/ (-∞)
      = -1/5 - 0
(चूंकि 1/∞ = 0)
1/f  = -1/5
f = -5 m
अतः उस व्यक्ति को 5 m फोकस दूरी के अवतल लेंस की आवश्यकता है।

अथवा

दूर दृष्टि दोष से आप क्या समझते हैं? इस दोष का निवारण कैसे किया जाता है?

उत्तर -  जब मनुष्य को दूर की वस्तुएँ तो स्पष्ट दिखाई देती है परंतु पास की वस्तुए स्पष्ट नहीं दिखाई देती इसे दूर दृष्टि दोष कहते है।
दूर दृष्टि दोष के कारणः यह रोग निम्न में से एक कारण से हो सकता है।
(1) लेंस से रेटिना की दूरी कम हो जाए अर्थात् नेत्र के गोले की त्रिज्या कम हो जाए।
(2) लेंस के पृष्ठो की वक्रता कम हो अर्थात् लेंस पतला हो जाए जिससे उसकी फोकस दूरी बढ़ जाए।

निवारणः- इस दोष में लेंस की फोकस दूरी अधिक हो जाती है। जिससे लेंस की अभिसारी क्षमता कम हो जाती है। अतः इस दोष के निवारण के लिए ऐसा लेंस प्रयुक्त करना चाहिए जो नेत्र की अभिसारी क्षमता को बढ़ा दे अर्थात् उत्तल लेंस प्रयुक्त किया जाता है।

(ख) एक विद्युत हीटर पर 250 वोल्ट व 2.0 किलोवाट लिखा है। पूरी क्षमता से कार्य करने पर इससे कितनी विद्युत धारा प्रवाहित होगी? इसे प्रतिदिन 10 घंटे कार्य करते रहने पर 30 दिन में कितनी kWh (किलोवाट घंटा) ऊर्जा व्यय होगी? 

उत्तर - विद्युत हीटर का,
विभवांतर V = 250 वोल्ट
क्षमता P = 2 किलोवाट
             = 2000 वाट

P = Vi
i = P / V
  = 2000/250
  = 8 एम्पियर

क्षमता P = 2 किलोवाट
             = 2000 वाट
घंटे = 10 घंटे
दिन = 30 दिन

यूनिटों की संख्या = (वाट × घंटे × दिन) / 1000

 = (2000 × 10 × 30 )/ 1000
 = 600 यूनिट

अथवा

समरूप चुम्बकीय क्षेत्र में किसी धारावाही चालक पर लगने वाले बल की व्याख्या कीजिए। चालक पर लगने वाले बल की दिशा किस नियम से ज्ञात की जाती है? स्पष्ट एवं सचित्र उल्लेख कीजिए।

उत्तर- यदि एक वाह्य चुम्बकीय क्षेत्र B में, चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा से θ कोण पर स्थित l लम्बाई के चालक विद्युत धारा प्रवाहित हो रही हो तो उस पर कार्य करने वाला बल F
 (i) चुम्बकीय क्षेत्र B के अनुक्रमानुपाती होता है, अर्थात
       F ∝ B                                ...(i) 
(ii) चालक में प्रवाहित धारा के अनुक्रमानुपाती होता है, अर्थात 
       F ∝ i                                 ...(ii) 

(iii) चालक की लम्बाई l के अनुक्रमानुपाती होता है, अर्थात
     F ∝ l                               ...(iii)
(iv) चालक तथा चुम्बकीय क्षेत्र के बीच बने कोण की ज्या (sine) के अनुक्रमानुपाती होता है, अर्थात
    F ∝ Sin θ                          ...(iv)
सभी को मिलाने पर,
    F ∝ Bil Sin θ  
    F = KBil Sin θ    
जहाँ K एक नियतांक है। SI प्रणाली में B का मात्रक इस प्रकार लेते हैं कि K = 1, तो 
F = iBl Sin θ    

चालक पर लगने वाला बल फ्लेमिंग के बाएं हाथ के नियम से ज्ञात की जाती है।

फ्लेमिंग के बाएँ हाथ का नियम (Fleming's left hand rule)- 
यदि हम अपने बाएँ हाथ के अंगूठे तथा अंगूठे के पास वाली दोनों अंगुलियों (तर्जनी तथा मध्यमा) को इस प्रकार फैलाएँ कि तीनों परस्पर लम्बवत रहें तब यदि पहली अंगुली चुम्बकीय क्षेत्र (B) की दिशा और बीच वाली अंगुली (मध्यमा) धारा i की दिशा प्रदर्शित करती है तो अँगूठा चालक पर लगने वाले बल F की दिशा को प्रदर्शित करेगा।

4. प्रदत्त विद्युत परिपथ में प्रत्येक प्रतिरोधक R1, R2, R3, R4, R5, R6, R7, R8 व R9  में बहने वाली विद्युत धारा व प्रत्येक प्रतिरोधक के सिरों के बीच उत्पन्न विभवान्तर की गणना कीजिए। यहाँ R1 = 1 Ω, R2 = R3 = R4 = 3 Ω व R5 = R6 = R7 = R8 = R9 = 5 Ω 
उत्तर-  चूँकि R2, R3 व R4 समान्तर क्रम में हैं इस लिए इनका तुल्य प्रतिरोध
1/R' = 1/R2 + 1/R3 + 1/R4
        = 1/3 + 1/3 + 1/3
        = (1 + 1 + 1) / 3
        = 3/3
        = 1Ω
इसी प्रकार से R5, R6, R7, R8 व R9 भी समान्तर क्रम में हैं इसलिए इनका तुल्य प्रतिरोध
1/R'' = 1/R5 + 1/R6 + 1/R7 + 1/R8 + 1/R9
         = 1/5 + 1/5 + 1/5 + 1/5 + 1/5
         = ( 1 + 1 + 1 + 1 + 1)  / 5
         = 5/5
         = 1Ω
अब परिपथ का तुल्य प्रतिरोध
R = 1Ω + 1Ω + 1Ω
    = 3Ω
अब ,
विभवांतर V = 4.5 वोल्ट
प्रतिरोध R = 3Ω
V = iR
i = V / R
  = 4.5 / 3
  = 1.5 एम्पियर

अब यही धारा पूरे परिपथ में बहेगी। तो
R1 के विभवांतर के लिए,
 प्रतिरोध R1 = 1Ω
 धारा i = 1.5 एम्पियर
V = iR
V1 = 1.5 × 1
      = 1.5 वोल्ट

R2, R3 व R4 के विभवांतर के लिए,
 तुल्य प्रतिरोध R1 = 1Ω
 धारा i = 1.5 एम्पियर
V = iR
V1 = 1.5 × 1
      = 1.5 वोल्ट
चूँकि सभी श्रेणी क्रम में है तो सभी विभवांतर सामान होगा। इसलिए V2 = V3 = V4 = 1.5 वोल्ट

R5, R6, R7, R8 व R9 के विभवांतर के लिए,
 तुल्य प्रतिरोध R1 = 1Ω
 धारा i = 1.5 एम्पियर
V = iR
V1 = 1.5 × 1
      = 1.5 वोल्ट
चूँकि सभी श्रेणी क्रम में है तो सभी विभवांतर सामान होगा। इसलिए V5 = V6 = V7 = V8 = V9 = 1.5 वोल्ट

अथवा

विद्युत धारा जनित्र किस सिद्धान्त पर कार्य करता है? नामांकित चित्र बनाकर इसकी कार्यविधि समझाइए।

उत्तर - विद्युत् जनित्र एक प्रकार का यंत्र है जो यांत्रिक ऊर्जा को प्रत्यावर्तित विद्युत् धारा में परिवर्तित करता है।

सिद्धांत : प्रत्यावर्तित विद्युत् जनित्र विद्युतचुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है। जब एक कुंडली समानांतर चुंबकीय क्षेत्र में घूर्णन करती है, तो चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं कुंडली से गुजरती हैं और विद्युत् प्रेरित करती हैं और इसमें विद्युत् स्थापित करती हैं।

रचना : इसके मुख्य भाग निम्नलिखित हैं
 1. चुंबक: एक शक्तिशाली अवतल बेलनाकार चुंबक जैसे नाल चुंबक का कार्य है शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र बनाना।

2. कुंडली: एक आयताकार लोहे के टुकड़े पर तांबे की तार लपेटकर उसे कुंडली का रूप दिया जाता है। जिसमें विद्युत् धारा प्रवाह की जाती है और इसे चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है जिससे इस पर बल लगता है और ये अपने अक्ष पर घूमता है। चित्र में ABCD कुंडली को दर्शाया गया है।

3. विभक्त वलय: यह अर्धगोल छल्ले होते हैं। ये कुंडली के दोनों सिरों से परस्पर जुड़े होते हैं और कुंडली के अर्ध घूर्णन के साथ ये भी घूर्णन करती हैं। चित्र में इन्हें S1 और S2 से दर्शाया गया है।

4. ब्रुश: B1 और B2 दो कार्बन या लचीले धातु की छड़ें हैं जो अर्धगोल छल्लों से परस्पर जुड़े होते हैं और इनका काम विद्युत् धारा को लोड तक ले जाना है। चित्र में इन्हें गैल्वेनोमीटर से जोड़ा गया है जो विद्युत् धारा को मापता है।
कार्यविधि : प्रारम्भ में ABCD स्थिति में कुण्डली चुम्बकीय बल रेखाओं के समान्तर है। जब कुण्डली को इस प्रकार घुमाया जाता है कि AB भाग ऊपर की ओर और CD भाग नीचे की ओर जाता है तो कुण्डली में से जाने वाले फ्लक्स में वृद्धि होती है फलतः कुण्डली में प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है। फ्लेमिंग के दाएँ हाथ के नियमानुसार कुण्डली में प्रेरित धारा B से A की ओर तथा D से C की ओर बहती है। जब कुण्डली लम्बवत हो जाती है तो विद्युत वाहक बल अधिकतम हो जाता है। इस स्थिति तक आने में कुण्डली 0° से 90° तक घूम चुकी होती है। 90° से 180° तक कुण्डली घूमने पर फ्लक्स में कमी होती है और 180° पर पहुँचकर विद्युत वाहक बल शून्य हो जाता है। 180° से 270° तक कुण्डली घूमने पर फ्लक्स में वृद्धि विपरीत दिशा में होती है। 270° पर विद्युत वाहक बल विपरीत दिशा में अधिकतम हो जाता है। 270° से 360° की ओर कुण्डली घूमने पर विद्युत वाहक बल घटता है और 360° पर यह पुनः शून्य हो जाता है। इस प्रकार कुण्डली में एक पूर्ण चक्कर में दो बार विद्युत वाहक वल अधिकतम किन्तु विपरीत दिशाओं में होता है और दो बार शून्य होता है। इस प्रकार आर्मेचर के निरन्तर घूमते रहने से कुण्डली से बाह्य परिपथ में धारा बहने लगती है। धारा की दिशा बदलती रहने के कारण, इसे प्रत्यावर्ती धारा डायनमो (जनित्र) कहा जाता है।

Physics विज्ञान अनसोल्व पेपर 2021 Science Unsolved Paper 2021 Set 1 (824 HX)

विज्ञान अनसोल्व पेपर 2021
Science Unsolved Paper 2021
Set 1 (824 HX)

खण्ड-क

1. (क) जब श्वेत प्रकाश एक प्रिज्म पर आपतित होता है, तो किस रंग का विचलन अधिकतम हो है?

(i) लाल

(ii) हरा

(iii) पीला

(iv) बैंगनी

उत्तर (iv) बैंगनी


(ख)  एक दर्पण की वक्रता त्रिज्या 40 सेमी है। उसकी फोकस दूरी होगी
 
(i) 20 सेमी 
 
(ii) 40 सेमी 

(iii) 80 सेमी 

(iv) 160 सेमी

उत्तर (i) 20 सेमी 


(ग) बिजली के बल्ब का फिलामेंट बना होता हैं

(i) ताँबे का

(ii) टंगस्टन का

(iii) नाइक्रोम का

(iv) एल्यूमीनियम का

उत्तर (ii) टंगस्टन का

(घ) चुम्बकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर कार्यकारी बल की दिशा ज्ञात करने के लिए नियम है।

(i) ओम का नियम

(ii) लेंज का नियम

(iii) फ्लेमिंग के दायें हाथ का नियम

(iv) फ्लेमिंग के बायें हाथ का नियम

उत्तर (iv) फ्लेमिंग के बायें हाथ का नियम


2. (क) प्रिज्म द्वारा अपवर्तन को समझाइये।

उत्तर.  
ABC एक प्रिज्म है। एक किरण PQ तल AB से अपवर्तित होकर QR दिशा में चली जाती है। यह किरण अब प्रिज्म के दूसरे तल AC पर पड़ती है तथा अपवर्तन के बाद RS दिशा में बाहर निकल जाती है। आपतित किरण PQ को आगे बढ़ाने तथा निर्गत किरण RS को पीछे बढ़ाने पर यह एक-दूसरे को बिन्दु D पर काटती हैं। इस प्रकार आपतित किरण PO तथा निर्गत किरण RS के बीच बने कोण को विचलन कोण कहते हैं तथा अक्षर δ से प्रदर्शित करते हैं। किसी विशेष आपतन कोण के लिए δ का मान न्यूनतम होता है।
इसे अल्पतम विचलन कोण कहते हैं तथा δm से प्रदर्शित करते हैं।
 यदि प्रिज्म का कोण A तथा उसका अल्पतम विचलन कोण δm हो तो प्रिज्म के पदार्थ का अपवर्तनांक n निम्न सूत्र से निकाला जा सकता है
 


(ख) मानव नेत्र के निकट बिन्दु और दूर बिन्दु में विभेद कीजिए।

निकट बिन्दु - वह न्यूनतम दूरी जिस पर रखी कोई वस्तु बिना किसी तनाव के अत्यधिक स्पष्ट देखी जा सकती है, उसे सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी कहते हैं। इसे नेत्र का निकट बिन्दु भी कहते हैं।

दूर बिन्दु - वह दूरतम बिन्दु जिस तक कोई नेत्र वस्तुओं को सुस्पष्ट देख सकता है, नेत्र का दूर बिन्दु कहलाता है। सामान्य नेत्र के लिए यह अनंत दूरी पर होता है।


(ग) उत्तल लेंस द्वारा प्रतिबिम्ब निर्माण को दर्शाइये जब वस्तु प्रकाशिक केन्द्र व फोकस के मध्य हो।

उत्तर- वस्तु प्रकाशिक केन्द्र तथा फोकस के बीच स्थित है-वस्तु की इस स्थिति में प्रतिबिम्ब लेन्स के उसी ओर, वस्तु के पीछे, आभासी, सीधा तथा वस्तु से बड़ा बनता है।

3. (क) एक व्यक्ति 30 सेमी से अधिक दूर की वस्तुओं को नहीं देख सकता है। यह कौन-सा दृष्टिदोष है? इसके निवारण के लिए प्रयुक्त लेंस की प्रकृति और फोकस दूरी ज्ञात कीजिए।

उत्तर - चूँकि व्यक्ति 30cm से अधिक दूर की वस्तुओं को नहीं देख सकता है इसलिए उसकी आँखों में निकट दृष्टि दोष है। इस दोष को दूर करने के लिए व्यक्ति को अवतल लेंस के चश्मे का प्रयोग करना होगा।
वस्तु की लेंस से दूरी u = ∞
प्रतिबिम्ब की लेंस से दूरी v = - 30 cm
फोकस दूरी f = ?
लेंस सूत्र से,
(1 / f)  = (1 / v) - (1 / u)
            = 1 / (-30) - 1 / ∞
            = 1 / (-30) - 0
            = 1 / (-30)
f = -30 cm
अर्थात व्यक्ति को 30 सेमी फोकस दूरी वाले अवतल लेंस के चश्मे की आवश्यकता है।

अथवा 

एक प्रकाश की किरण माध्यम-I से चलकर चित्रानुसार माध्यम-II में प्रवेश करती है। कौन-सा माध्यम सघन है? माध्यम-I के सापेक्ष माध्यम II का अपवर्तनांक ज्ञात कीजिए।
उत्तर- चूँकि, आपतन कोण < अपवर्तन कोण
इसलिए माध्यम 1 सघन माध्यम है।

1n2 = Sin i / Sin r

       = Sin 30° / Sin 45°

       = (1/2) / (1/ √2)

         = (1/2) × (√2 / 1)

        = 1 / √2


(ख) किसी चालक तार का प्रतिरोध किन-किन कारकों पर निर्भर करता है? 

उत्तर-  एक निश्चित ताप पर किसी चालक तार का प्रतिरोध तार की लम्बाई, अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल तथा पदार्थ पर निम्न प्रकार निर्भर करता है
 (A) किसी तार का प्रतिरोध R उसकी लम्बाई l के अनुक्रमानुपाती होता है, 
 R ∝ l                ......(¡)

(B) किसी तार का प्रतिरोध R उसके अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल A के व्युत्क्रमानुपाती होता है, 
R ∝ 1/A           .......(¡¡)

(c) समान लम्बाई तथा समान अनुप्रस्थ काट के भिन्न-भिन्न पदार्थों से बने तारों का प्रतिरोध भिन्न-भिन्न होता है।
समीकरण (¡) व (¡¡) से

R ∝ l / A
R = ρ l / A
जहाँ ρ एक नियतांक है, जिसे तार के पदार्थ का विशिष्ट प्रतिरोध कहते हैं। इसका मात्रक Ω मीटर होता है।



अथवा

एक तार से 5 एम्पियर की धारा प्रवाहित हो रही है। 10 मिनट में तार से कितना आवेश प्रवाहित होगा? तार से प्रति सेकंड प्रवाहित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ज्ञात कीजिए।

उत्तर - 
धारा (i) = 5 एम्पियर
समय (t) = 10 मिनट
             = 10 × 60 सेकेंड
             = 600 सेकेंड
आवेश (q) = ?
q = it
   = 5 × 600 कूलाम
   = 3000 कूलाम

q = ne.    
n = q / e
n = 3000 / 1.6 × 10 -19 
n = (30000 × 10 19 ) /16
n =    (30 × 10 22 ) / 16
n = 1.875 × 10 22

 4. प्रत्यावर्ती धारा जनित्र के सिद्धांत, संरचना तथा क्रियाविधि का नामांकित सचित्र वर्णन कीजिए।

 उत्तर- विद्युत जनित्र का सिद्धान्त विद्युत जनित्र विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धान्त पर कार्य करता है अर्थात् परिवर्तनशील चुम्बकीय क्षेत्र के कारण चालक में विद्युत धारा प्रेरित होती है। फ्लेमिंग के दाएँ हस्त के नियम से प्रेरित धारा की दिशा ज्ञात करते हैं। विद्युत जनित्र में आर्मेचर को शक्तिशाली चुम्बकों के ध्रुवों के बीच घुमाया जाता है जिसके कारण आर्मेचर से गुजरने वाली चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं की संख्या में परिवर्तन होता है तथा प्रेरित धारा उत्पन्न होती है।
 संरचना -(i) ABCD आर्मेचर अपने अक्ष के चारों तरफ घूर्णनशील होता है। 
(ii) आर्मेचर पर अवरोधी ताँबे की तार की लपेटें होती हैं।
(iii) ताँबे की तारों की दो सिरे धातु के बने दो वलय S1 एवं S2 से जुड़े होते हैं। ये दोनों वलय स्थिर दो कार्बन ब्रुशों B1 एवं B2 के सम्पर्क में रहते हैं।
(iv) दोनों ब्रुशों का सम्पर्क गैल्वेनोमीटर (G) से होता है। 

कार्यविधि- (i) आर्मेचर को यांत्रिक रूप से दो शक्तिशाली चुम्बकों के ध्रुवों के बीच घुमाया जाता है। 
(ii) दो वलय भी घूमते हैं किन्तु दोनों वलय अलग-अलग दोनों कार्बन ब्रुशों के सम्पर्क में रहते हैं।
(iii) गति के समय जब AB भुजा ऊपर एवं CD नीचे की तरफ रहती है, आर्मेचर में धारा की दिशा A से B एवं C से D होती है।
(iv) यदि आर्मेचर की भुजा CD ऊपर एवं AB नीचे हों तो फ्लेमिंग के दाएँ हस्त के नियम से धारा की दिशा D से C एवं B से A की तरफ हो जाती है। इस प्रकार आर्मेचर के एक घूर्णन में धारा की दिशा दो बार परिवर्तित होती है। अतः इस यंत्र द्वारा प्रत्यावर्ती धारा उत्पन्न होती है।

   अथवा

विद्युत चुम्बकीय प्रेरण से क्या तात्पर्य है? फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण संबंधी प्रयोग समझाइये। प्रेरित धारा की दिशा ज्ञात करने वाले नियम लिखिए।

उत्तर- फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण सम्बन्धी निम्न दो नियम हैं
 (i) प्रथम नियम- जब किसी बन्द कुण्डली में से गुजरने वाले चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है तो उस कुण्डली में एक प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है तथा कुण्डली में प्रेरित धारा बहने लगती है। यह धारा केवल तभी तक बहती है जब तक कि चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता रहता है।

(ii) द्वितीय नियम - बन्द कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल का मान, चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन की दर के अनुक्रमानुपाती होता है अर्थात्
  जहाँ Φ1 प्रारम्भिक फ्लक्स तथा Φ2  , t समय बाद का फ्लक्स है (ॠण का चिह्न केवल यह प्रदर्शित करता है कि प्रेरित विद्युत वाहक बल, फ्लक्स परिवर्तन का विरोध करता है)।

  प्रयोग द्वारा विद्युत चुम्बकीय प्रेरण का प्रदर्शन - पृथक्कित तारों की एक कुण्डली बनाकर चित्र के अनुसार एक परिपथ तैयार करते हैं।
 जब हम एक छड़ चुम्बक के उत्तरी ध्रुव N को कुण्डली की ओर लाते हैं तो धारामापी में एक विक्षेप आता है। धारामापी में यह विक्षेप कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल के कारण होता है। जब हम चुम्बक को कुण्डली से दूर ले जाते हैं तो धारामापी में पुनः विक्षेप आता है, लेकिन यह विक्षेप पहले के विपरीत दिशा में होता है।

  इसी प्रकार जब हम छड़ चुम्बक के दक्षिणी ध्रुव S को कुण्डली के पास लाते हैं या दूर ले जाते हैं तो प्रत्येक दशा में विक्षेप पहले वाले विक्षेप से विपरीत दिशा में होता है।

   उपर्युक्त प्रयोग में धारामापी में विक्षेप केवल तभी तक होता है जब तक कुण्डली तथा चुम्बक में आपेक्षिक गति होती है। दोनों के स्थिर रहने या दोनों के समान वेग से एक ही दिशा में चलने पर धारामापी में कोई विक्षेप नहीं आता है। स्पष्ट है कि सेल न होने पर भी धारामापी में क्षणिक विक्षेप आता है। अतः इस प्रयोग से विद्युत चुम्बकीय प्रेरण का प्रदर्शन होता है। कुण्डली में प्रेरित विद्युत वाहक बल अथवा प्रेरित धारा की दिशा का निर्धारण लेन्ज के नियम (Lenz's Law) द्वारा होता है।

मात्रक

मात्रक की परिभाषा :-

“भौतिक राशि के मापन के लिए नियत किये गए मान को मात्रक कहते है।”

मानक मात्रक किसे कहते हैं (Standard Unit) :-

मानक मात्रक की परिभाषा इस प्रकार है, “किसी भौतिक राशि के निश्चित वास्तविक मूर्त रूप को उस राशि का मानक मात्रक कहते है।”

किसी भौतिक राशि का मात्रक चयन करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए :-

  • चयन किए गए मात्रक सर्वमान्य, उचित आकार तथा परिमाण के हों।
  • चयनित मात्रक, ताप दाब व समय के परिवर्तन से प्रभावित नहीं हो।
  • चयनित मात्रक सरलता से परिभाषित किए जा सके एवं प्रत्येक स्थान पर उनके प्रतिरूप सरलता से बनाए जा सके।

मात्रक पद्धतियां (System of Unit)

भौतिक राशियां के मूल मात्रकों के आधार पर निम्नलिखित पद्धतियां प्रचलित हैं।

(i) C.G.S. (सेन्टीमीटर- ग्राम – सेकण्ड) पद्धति या गॉसिय पद्धति

इस पद्धति में द्रव्यमान, लंबाई, समय को क्रमश ग्राम, सेंटीमीटर, सेकण्ड में नापा जाता है।

(ii) M.K.S. (मीटर – किलोग्राम – सेकण्ड) पद्धति या जार्जी पद्धति

इस पद्धति में द्रव्यमान, लंबाई, समय को क्रमश किलोग्राम, मीटर, सेकण्ड में नापा जाता है।

(iii) F.P.S. (फुट – पाउंड – सेकण्ड)

इस पद्धति में द्रव्यमान, लंबाई, समय की इकाई क्रमश पाउंड, फुट, सेकण्ड होता है।

(iv) International System of Units (S.I) (अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति)

यह पद्धति 1960 में अन्तर्राष्ट्रीय माप तौल समिति द्वारा लागू की गई। यह पद्धति M.K.S. का परिवर्तित रूप है।

मात्रक के प्रकार (type of unit)

भौतिक राशियों के मात्रकों को निम्न प्रकार में बांटा गया है।

(1) मूल मात्रक किसे कहते हैं (Base Unit in Hindi) :-

मूल राशियों के मात्रक मूल मात्रक कहलाते है। SI पद्धति में 7 मूल मात्रक है।

(2) व्युत्पन्न मात्रक (Derived Units in Hindi) :-

व्युत्पन्न मात्रक किसे कहते हैं ?:-

व्युत्पन्न राशियों के मात्रक या वे मात्रक जिन्हें मूल मात्रकों के रूप में व्यक्त किया जा सकता है , व्युत्पन्न मात्रक कहलाते है।

जैसे चाल का मात्रक = दूरी का मात्रक/ समय का मात्रक

= मीटर / सैकंड = m/s

कुछ व्युत्पन्न मात्रकों के नाम महान वैज्ञानिकों के समान में रखे गए है।

जैसे – बल का मात्रक – न्यूटन(N), आवृत्ति का मात्रक – हर्ट्ज (Hz)

(3) पूरक मात्रक (Supplementry Units in Hindi) :-

पूरक मात्रक किसे कहते हैं :- “मात्रक की अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति में दो पूरक मात्रक भी परिभाषित किए है , समतल कोण के लिए रेडियन (rad) और ठोस कोण के लिए स्टरेडियन (sr)।

पूरक मात्रक विमहिन होते है।

(i) रेडियन (rad) :- 1 रेडियन वह कोण है जो त्रिज्या के बराबर चाप द्वारा वृत के केंद्र पर बनाया जाता है।

(ii) स्टरेडियन (sr) :- 1 स्टरेडियन वह ठोस कोण है जो गोले की त्रिज्या के वर्ग के बराबर क्षेत्रफल की गोले की सतह द्वारा गोले के केंद्र पर बनाया जाता है।

(4) प्रायोगिक मात्रक (Practical Units in Hindi) :-

SI मात्रकों के निश्चित मान होने के कारण, कुछ प्रायोगिक मात्रकों को मूलभूत तथा व्युत्पन्न राशियों के लिए परिभाषित किया गया है। जैसे प्रकाश वर्ष दूरी (मूलभूत राशि) का प्रायोगिक मात्रक है और अश्व शक्ति (hp) शक्ति (व्युत्पन्न राशि) का प्रायोगिक मात्रक है। प्रायोगिक मात्रक किसी निश्चित पद्धति से संबंधित हो ऐसा आवश्यक नहीं है। लेकिन उन्हें मात्रकों की किसी भी पद्धति में व्यक्त किया का सकता है।

उदाहरण :- 1 मील (mile) = 1.6 km =1.6×103 m = 1.6×105 cm

(5) अनुपयुक्त मात्रक (Improper Unit in Hindi)

ये वे मात्रक होते है जिनकी प्रकृति उन भौतिक राशियों की प्रकृति के समान नहीं होती है जिसके लिए इनका उपयोग किया जाता है।

उदाहरण :- किग्रा – भार (Kg-wt) भार का अनुपयुक्त मात्रक है। यहां किग्रा द्रव्यमान मान का मात्रक है, लेकिन इसका उपयोग भार को मापने के लिए किया गया है।